Digital Ishq Priya Malik Lyrics

Digital Ishq Priya Malik Lyrics

रोज सुबह जब मेरे कमरे में
धूप का छोटा सा टुकड़ा कोने में बैठा हुआ मिलता है
तुम्हारी करवटों की तरह जब आसमान भी अपनी साइज बदलने लगता है
मानो कोई व्हाट्सएप की ग्रुप चैट हो
जिसमें कई बाशिंदों की घुसपैठ हो
पूरी सुबह,
पूरी दोपहर,
पूरी रात
तुम्हारे यहां ना होते हुए भी तुम्हारी तअसूर की नोटिफिकेशन
यह घर बादस्तूर मुझे दिया करता है
इस घर में कुछ बर्तन भी है
जो एक दूसरे से मैच नहीं होते
कुछ तुम्हारे घर से हैं
कुछ मेरी cupboard से
जो Twitter intellectuals की तरह बजते ही रहते हैं बात Outrange करते हैं,
फिर यादों की ट्रोलिंग में फंसते हैं
दिल के इंस्टाग्राम मे सिर्फ तुम्हारी तस्वीर ही नहीं
तुम्हारी जुस्तजू भी crop नहीं होती
मैंने Adjust करके देख लिया
लेकिन ये पिक्चर कभी फ्लॉप नहीं होती अलमारी में तुम्हारी कपड़ों की तरह एक #Hashtang में प्यार लटकता है
सारे स्टेटस लगा के देख लिया,
लेकिन यह बूमरैंग का फैन लगता है
सुना है फेसबुक पर अब सिर्फ लाइक ही नहीं लव भी हुआ करता है
ठीक उसी तरह जैसे मेरे घर का चूल्हा
अब तुम्हारी तपीस का मुंतजिर लगता है
जिस दिन तुम घर पर खाते हो
तुम्हारी पसंद का खाना पकता है
मुझे ख्वाबीदा कहो या कहो तलबगार
ये तो Reddit सा पेचीदा लगता है
एक बात तुम मेरी जान लो
और अब इस बात को तुम मान भी लो
कि स्नैपचैट की तरह चंद पलों का नहीं
ये तो आधार कार्ड की तरह पूरी जिंदगी का मामला लगता है
कोई चाहे लाईक, शेयर, सब्क्राइब ना भी करें
यहां तो बस इश्क का चैनल चलता है
यहां तो बस इश्क का चैनल चलता है..

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